श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.4.32

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

दासवत्संनतार्याङ्‌घ्रिः पितृवद्दीनवत्सलः।

भ्रातृवत्सदृशे स्निग्धो गुरुष्वीश्‍वरभावनः।

विद्यार्थरूपजन्माढ्यो मानस्तम्भविवर्जितः॥ ३२

dāsavatsaṃnatāryāṅghriḥ pitṛvaddīnavatsalaḥ|

bhrātṛvatsadṛśe snigdho guruṣvīśvarabhāvanaḥ|

vidyārtharūpajanmāḍhyo mānastambhavivarjitaḥ|| 32

अर्थ

बड़े लोगोंके चरणोंमें सेवककी तरह झुककर रहते थे। गरीबोंपर पिताके समान स्नेह रखते थे। बराबरीवालोंसे भाईके समान प्रेम करते और गुरुजनोंमें भगवद्भाव रखते थे। विद्या, धन, सौन्दर्य और कुलीनतासे सम्पन्‍न होनेपर भी घमंड और हेकड़ी उन्हें छूतक नहीं गयी थी॥ ३२॥

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