युधिष्ठिरने पूछा—नारदजी! आपका व्रत अखण्ड है। अब हम आपसे यह जानना चाहते हैं कि हिरण्यकशिपुने पिता होकर भी ऐसे शुद्धहृदय महात्मा पुत्रसे द्रोह क्यों किया॥ ४४॥
देवर्ष एतदिच्छामो वेदितुं तव सुव्रत।
यदात्मजाय शुद्धाय पितादात् साधवे ह्यघम्॥ ४४
युधिष्ठिरने पूछा—नारदजी! आपका व्रत अखण्ड है। अब हम आपसे यह जानना चाहते हैं कि हिरण्यकशिपुने पिता होकर भी ऐसे शुद्धहृदय महात्मा पुत्रसे द्रोह क्यों किया॥ ४४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.4.44 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 828) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/4/44/