श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.4.46

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

किमुतानुवशान् साधूंस्तादृशान् गुरुदेवतान्।

एतत् कौतूहलं ब्रह्मन्‍नस्माकं विधम प्रभो।

पितुः पुत्राय यद् द्वेषो मरणाय प्रयोजितः॥ ४६

kimutānuvaśān sādhūṃstādṛśān gurudevatān|

etat kautūhalaṃ brahmannasmākaṃ vidhama prabho|

pituḥ putrāya yad dveṣo maraṇāya prayojitaḥ|| 46

अर्थ

फिर प्रह्लादजी-जैसे अनुकूल, शुद्धहृदय एवं गुरुजनोंमें भगवद्भाव करनेवाले पुत्रोंसे भला, कोई द्वेष कर ही कैसे सकता है। नारदजी! आप सब कुछ जानते हैं। हमें यह जानकर बड़ा कौतूहल हो रहा है कि पिताने द्वेषके कारण पुत्रको मार डालना चाहा। आप कृपा करके मेरा यह कुतूहल शान्त कीजिये॥ ४६॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां सप्तमस्कन्धे
प्रह्रादचरिते चतुर्थोऽध्यायः
॥ ४॥

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