श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.4.8

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

देवोद्यानश्रिया जुष्टमध्यास्ते स्म त्रिविष्टपम्।

महेन्द्रभवनं साक्षान्‍निर्मितं विश्‍वकर्मणा।

त्रैलोक्यलक्ष्म्यायतनमध्युवासाखिलर्द्धिमत्॥ ८

devodyānaśriyā juṣṭamadhyāste sma triviṣṭapam|

mahendrabhavanaṃ sākṣānnirmitaṃ viśvakarmaṇā|

trailokyalakṣmyāyatanamadhyuvāsākhilarddhimat|| 8

अर्थ

अब वह नन्दनवन आदि दिव्य उद्यानोंके सौन्दर्यसे युक्त स्वर्गमें ही रहने लगा था। स्वयं विश्‍वकर्माका बनाया हुआ इन्द्रका भवन ही उसका निवासस्थान था। उस भवनमें तीनों लोकोंका सौन्दर्य मूर्तिमान् होकर निवास करता था। वह सब प्रकारकी सम्पत्तियोंसे सम्पन्‍न था॥ ८॥✎ 581 2021

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #581 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्‌से
  • #2021 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): ढि़ → ढ़ि

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