प्रह्लाद गुरुजीका पढ़ाया हुआ पाठ सुन लेते थे और उसे ज्यों-का-त्यों उन्हें सुना भी दिया करते थे। किन्तु वे उसे मनसे अच्छा नहीं समझते थे। क्योंकि उस पाठका मूल आधार था अपने और परायेका झूठा आग्रह॥ ३॥
यत्तत्र गुरुणा प्रोक्तं शुश्रुवेऽनु पपाठ च।
न साधु मनसा मेने स्वपरासद्ग्रहाश्रयम्॥ ३
प्रह्लाद गुरुजीका पढ़ाया हुआ पाठ सुन लेते थे और उसे ज्यों-का-त्यों उन्हें सुना भी दिया करते थे। किन्तु वे उसे मनसे अच्छा नहीं समझते थे। क्योंकि उस पाठका मूल आधार था अपने और परायेका झूठा आग्रह॥ ३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.5.3 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 828) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/5/3/