श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.5.31

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

न ते विदुः स्वार्थगतिं हि विष्णुं

दुराशया ये बहिरर्थमानिनः।

अन्धा यथान्धैरुपनीयमाना

वाचीशतन्त्यामुरुदाम्नि बद्धाः॥ ३१

na te viduḥ svārthagatiṃ hi viṣṇuṃ

durāśayā ye bahirarthamāninaḥ|

andhā yathāndhairupanīyamānā

vācīśatantyāmurudāmni baddhāḥ|| 31

अर्थ

जो इन्द्रियोंसे दीखनेवाले बाह्य विषयोंको परम इष्ट समझकर मूर्खतावश अन्धोंके पीछे अन्धोंकी तरह गड्ढेमें गिरनेके लिये चले जा रहे हैं और वेदवाणीरूप रस्सीके—काम्यकर्मोंके दीर्घ बन्धनमें बँधे हुए हैं, उनको यह बात मालूम नहीं कि हमारे स्वार्थ और परमार्थ भगवान् विष्णु ही हैं—उन्हींकी प्राप्तिसे हमें सब पुरुषार्थोंकी प्राप्ति हो सकती है॥ ३१॥

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