प्रह्लादकी बातको वह सह न सका। रोषके मारे उसके नेत्र लाल हो गये। वह कहने लगा—‘दैत्यो! इसे यहाँसे बाहर ले जाओ और तुरंत मार डालो। यह मार ही डालने योग्य है॥ ३४॥
आहामर्षरुषाविष्टः कषायीभूतलोचनः।
वध्यतामाश्वयं वध्यो निःसारयत नैर्ऋताः॥ ३४
प्रह्लादकी बातको वह सह न सका। रोषके मारे उसके नेत्र लाल हो गये। वह कहने लगा—‘दैत्यो! इसे यहाँसे बाहर ले जाओ और तुरंत मार डालो। यह मार ही डालने योग्य है॥ ३४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.5.34 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 832) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/5/34/
टिप्पणियाँ
२
प्रा० पा०—कषायीकृत०।
(मुद्रित पृष्ठ 832)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
#1099 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): नैऋर्ता:॥ → नैऋर्ऋताः॥
#1100 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): नैऋर्ऋता:॥ → नैर्ऋताः॥