॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 7.5.53
यथा त्रिवर्गं गुरुभिरात्मने उपशिक्षितम्।
न साधु मेने तच्छिक्षां द्वन्द्वारामोपवर्णिताम्॥ ५३
yathā trivargaṃ gurubhirātmane upaśikṣitam|
na sādhu mene tacchikṣāṃ dvandvārāmopavarṇitām|| 53
अर्थ
परन्तु गुरुओंकी वह शिक्षा प्रह्लादको अच्छी न लगी। क्योंकि गुरुजी उन्हें केवल अर्थ, धर्म और कामकी ही शिक्षा देते थे। यह शिक्षा केवल उन लोगोंके लिये है, जो राग-द्वेष आदि द्वन्द्व और विषयभोगोंमें रस ले रहे हों॥ ५३॥