नारदजी कहते हैं—प्रह्लादजीके मुँहसे शत्रुपक्षकी प्रशंसासे भरी बात सुनकर हिरण्यकशिपु ठठाकर हँस पड़ा। उसने कहा—‘दूसरोंके बहकानेसे बच्चोंकी बुद्धि यों ही बिगड़ जाया करती है॥ ६॥
श्रुत्वा पुत्रगिरो दैत्यः परपक्षसमाहिताः।
जहास बुद्धिर्बालानां भिद्यते परबुद्धिभिः॥ ६
नारदजी कहते हैं—प्रह्लादजीके मुँहसे शत्रुपक्षकी प्रशंसासे भरी बात सुनकर हिरण्यकशिपु ठठाकर हँस पड़ा। उसने कहा—‘दूसरोंके बहकानेसे बच्चोंकी बुद्धि यों ही बिगड़ जाया करती है॥ ६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.5.6 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 829) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/5/6/