श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.6.18

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

ततो विदूरात् परिहृत्य दैत्या

दैत्येषु सङ्गं विषयात्मकेषु।

उपेत नारायणमादिदेवं

स१ मुक्तसङ्गैरिषितोऽपवर्गः॥ १८

tato vidūrāt parihṛtya daityā

daityeṣu saṅgaṃ viṣayātmakeṣu|

upeta nārāyaṇamādidevaṃ

sa muktasaṅgairiṣito'pavargaḥ|| 18

अर्थ

इसलिये भाइयो! तुमलोग विषयासक्त दैत्योंका संग दूरसे ही छोड़ दो और आदिदेव भगवान् नारायणकी शरण ग्रहण करो! क्योंकि जिन्होंने संसारकी आसक्ति छोड़ दी है, उन महात्माओंके वे ही परम प्रियतम और परम गति हैं॥ १८॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—संमुक्त०।

    (मुद्रित पृष्ठ 839)

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