इसलिये सांसारिक सुखके उद्देश्यसे प्रयत्न करनेकी कोई आवश्यकता नहीं है। क्योंकि स्वयं मिलनेवाली वस्तुके लिये परिश्रम करना आयु और शक्तिको व्यर्थ गँवाना है। जो इनमें उलझ जाते हैं, उन्हें भगवान्के परम कल्याणस्वरूप चरणकमलोंकी प्राप्ति नहीं होती॥ ४॥✎ 589
तत्प्रयासो न कर्तव्यो यत आयुर्व्ययः परम्।
न तथा विन्दते क्षेमं मुकुन्दचरणाम्बुजम्॥ ४
इसलिये सांसारिक सुखके उद्देश्यसे प्रयत्न करनेकी कोई आवश्यकता नहीं है। क्योंकि स्वयं मिलनेवाली वस्तुके लिये परिश्रम करना आयु और शक्तिको व्यर्थ गँवाना है। जो इनमें उलझ जाते हैं, उन्हें भगवान्के परम कल्याणस्वरूप चरणकमलोंकी प्राप्ति नहीं होती॥ ४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.6.4 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 836) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/6/4/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)