श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.7.46

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

निरूप्यतामिह स्वार्थः कियान्देहभृतोऽसुराः।

निषेकादिष्ववस्थासु क्लिश्यमानस्य कर्मभिः॥ ४६

nirūpyatāmiha svārthaḥ kiyāndehabhṛto'surāḥ|

niṣekādiṣvavasthāsu kliśyamānasya karmabhiḥ|| 46

अर्थ

भाइयो! तनिक विचार तो करो—जो जीव गर्भाधानसे लेकर मृत्युपर्यन्त सभी अवस्थाओंमें अपने कर्मोंके अधीन होकर क्लेश-ही-क्लेश भोगता है, उसका इस संसारमें स्वार्थ ही क्या है ॥ ४६॥

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