श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.8.12

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

हिरण्यकशिपुरुवाच

व्यक्तं त्वं मर्तुकामोऽसि योऽतिमात्रं विकत्थसे।

मुमूर्षूणां हि मन्दात्मन् ननु स्युर्विप्लवा गिरः॥ १२

vyaktaṃ tvaṃ martukāmo'si yo'timātraṃ vikatthase|

mumūrṣūṇāṃ hi mandātman nanu syurviplavā giraḥ|| 12

अर्थ

हिरण्यकशिपुने कहा—रे मन्दबुद्धि! तेरे बहकनेकी भी अब हद हो गयी है। यह बात स्पष्ट है कि अब तू मरना चाहता है। क्योंकि जो मरना चाहते हैं, वे ही ऐसी बेसिर-पैरकी बातें बका करते हैं॥ १२॥

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