विशाल शरीर स्वर्गका स्पर्श कर रहा था। गरदन कुछ नाटी और मोटी थी। छाती चौड़ी और कमर बहुत पतली थी। चन्द्रमाकी किरणोंके समान सफेद रोएँ सारे शरीरपर चमक रहे थे, चारों ओर सैकड़ों भुजाएँ फैली हुई थीं, जिनके बड़े-बड़े नख आयुधका काम देते थे॥ २२॥✎ 607
दिविस्पृशत्कायमदीर्घपीवर-
ग्रीवोरुवक्षःस्थलमल्पमध्यमम् ।
चन्द्रांशुगौरैश्छुरितं तनूरुहै-
र्विष्वग्भुजानीकशतं नखायुधम्॥ २२
विशाल शरीर स्वर्गका स्पर्श कर रहा था। गरदन कुछ नाटी और मोटी थी। छाती चौड़ी और कमर बहुत पतली थी। चन्द्रमाकी किरणोंके समान सफेद रोएँ सारे शरीरपर चमक रहे थे, चारों ओर सैकड़ों भुजाएँ फैली हुई थीं, जिनके बड़े-बड़े नख आयुधका काम देते थे॥ २२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.8.22 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 850) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/8/22/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#607 शब्दोंके बीचका स्थान: नृसिंहभगवान् पर → नृसिंहभगवान्पर