श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.8.35

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

निशम्य लोकत्रयमस्तकज्वरं

तमादिदैत्यं हरिणा हतं मृधे।

प्रहर्षवेगोत्कलितानना मुहुः

प्रसूनवर्षैर्ववृषुः सुरस्त्रियः॥ ३५

niśamya lokatrayamastakajvaraṃ

tamādidaityaṃ hariṇā hataṃ mṛdhe|

praharṣavegotkalitānanā muhuḥ

prasūnavarṣairvavṛṣuḥ surastriyaḥ|| 35

अर्थ

युधिष्ठिर! जब स्वर्गकी देवियोंको यह शुभ समाचार मिला कि तीनों लोकोंके सिरकी पीड़ाका मूर्तिमान् स्वरूप हिरण्यकशिपु युद्धमें भगवान्‌के हाथों मार डाला गया, तब आनन्दके उल्लाससे उनके चेहरे खिल उठे। वे बार-बार भगवान्‌पर पुष्पोंकी वर्षा करने लगीं॥ ३५॥✎ 615

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #615 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् पर → भगवान्‌पर

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