श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.8.45

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

सिद्धा ऊचुः

यो नो गतिं योगसिद्धामसाधुरहारषीद् योगतपोबलेन।✎ 1536

नानादर्पं तं नखैर्निर्ददार तस्मै तुभ्यं प्रणताः स्मो नृसिंह॥ ४५

yo no gatiṃ yogasiddhāmasādhurahāraṣīd yogatapobalena|

nānādarpaṃ taṃ nakhairnirdadāra tasmai tubhyaṃ praṇatāḥ smo nṛsiṃha|| 45

अर्थ

सिद्धोंने कहा—नृसिंहदेव! इस दुष्टने अपने योग और तपस्याके बलसे हमारी योगसिद्ध गति छीन ली थी। अपने नखोंसे आपने उस घमंडीको फाड़ डाला है। हम आपके चरणोंमें विनीतभावसे नमस्कार करते हैं॥ ४५॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1536 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: योगसिद्धामसाधु- रहारषीद् → योगसिद्धामसाधुरहारषीद्

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