‘मूर्ख! तू बड़ा उद्दण्ड हो गया है। स्वयं तो नीच है ही, अब हमारे कुलके और बालकोंको भी फोड़ना चाहता है! तूने बड़ी ढिठाईसे मेरी आज्ञाका उल्लंघन किया है। आज ही तुझे यमराजके घर भेजकर इसका फल चखाता हूँ॥ ६॥
हे दुर्विनीत मन्दात्मन्कुलभेदकराधम।
स्तब्धं मच्छासनोद्धूतं नेष्ये त्वाद्य यमक्षयम्॥ ६
‘मूर्ख! तू बड़ा उद्दण्ड हो गया है। स्वयं तो नीच है ही, अब हमारे कुलके और बालकोंको भी फोड़ना चाहता है! तूने बड़ी ढिठाईसे मेरी आज्ञाका उल्लंघन किया है। आज ही तुझे यमराजके घर भेजकर इसका फल चखाता हूँ॥ ६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.8.6 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 848) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/8/6/