श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.9.17

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

यस्मात् प्रियाप्रियवियोगसयोगजन्म-

शोकाग्‍निना सकलयोनिषु दह्यमानः।

दुःखौषधं तदपि दुःखमतद्धियाहं

भूमन्भ्रमामि वद मे तव दास्ययोगम्॥ १७

yasmāt priyāpriyaviyogasayogajanma-

śokāgninā sakalayoniṣu dahyamānaḥ|

duḥkhauṣadhaṃ tadapi duḥkhamataddhiyāhaṃ

bhūmanbhramāmi vada me tava dāsyayogam|| 17

अर्थ

अनन्त! मैं जिन-जिन योनियोंमें गया, उन सभी योनियोंमें प्रियके वियोग और अप्रियके संयोगसे होनेवाले शोककी आगमें झुलसता रहा। उन दुःखोंको मिटानेकी जो दवा है, वह भी दुःखरूप ही है। मैं न जाने कबसे अपनेसे अतिरिक्त वस्तुओंको आत्मा समझकर इधर-उधर भटक रहा हूँ। अब आप ऐसा साधन बतलाइये जिससे कि आपकी सेवा-भक्ति प्राप्त कर सकूँ॥ १७॥

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