॥ श्रीहरिः ॥
तथेति शनकै राजन्महाभागवतोऽर्भकः।
उपेत्य१ भुवि कायेन ननाम विधृताञ्जलिः॥ ४
tatheti śanakai rājanmahābhāgavato'rbhakaḥ|
upetya bhuvi kāyena nanāma vidhṛtāñjaliḥ|| 4
अर्थ
भगवान्के परम प्रेमी प्रह्लाद ‘जो आज्ञा’ कहकर और धीरेसे भगवान्के पास जाकर हाथ जोड़ पृथ्वीपर साष्टांग लोट गये॥ ४॥✎ 618
तथेति शनकै राजन्महाभागवतोऽर्भकः।
उपेत्य भुवि कायेन ननाम विधृताञ्जलिः॥ ४
भगवान्के परम प्रेमी प्रह्लाद ‘जो आज्ञा’ कहकर और धीरेसे भगवान्के पास जाकर हाथ जोड़ पृथ्वीपर साष्टांग लोट गये॥ ४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.9.4 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 857) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/9/4/टिप्पणियाँ
- १
प्रा० पा०—उत्पत्य।
(मुद्रित पृष्ठ 857)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
- #618 शब्दोंके बीचका स्थान: नृसिंहभगवान् ने → नृसिंहभगवान्ने