श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.10.22

नवम स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

रामस्तमाह पुरुषादपुरीष यन्‍नः

कान्तासमक्षमसतापहृता श्‍ववत्१ ते।

त्यक्तत्रपस्य फलमद्य जुगुप्सितस्य

यच्छामि काल इव कर्तुरलंघ्यवीर्यः॥ २२

rāmastamāha puruṣādapurīṣa yannaḥ

kāntāsamakṣamasatāpahṛtā śvavat te|

tyaktatrapasya phalamadya jugupsitasya

yacchāmi kāla iva karturalaṃghyavīryaḥ|| 22

अर्थ

भगवान् श्रीरामजीने रावणसे कहा—‘नीच राक्षस! तुम कुत्तेकी तरह हमारी अनुपस्थितिमें हमारी प्राणप्रिया पत्‍नीको हर लाये! तुमने दुष्टताकी हद कर दी! तुम्हारे-जैसा निर्लज्ज तथा निन्दनीय और कौन होगा। जैसे कालको कोई टाल नहीं सकता—कर्तापनके अभिमानीको वह फल दिये बिना रह नहीं सकता, वैसे ही आज मैं तुम्हें तुम्हारी करनीका फल चखाता हूँ’॥ २२॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    स्वयन्ते।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 56)

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