उस समय जैसे मृतक शरीरमें प्राणोंका संचार हो जाय, वैसे ही माताएँ अपने पुत्रोंके आगमनसे हर्षित हो उठीं। उन्होंने उनको अपनी गोदमें बैठा लिया और अपने आँसुओंसे उनका अभिषेक किया। उस समय उनका सारा शोक मिट गया॥ ४८॥✎ 1639
पुत्रान् स्वमातरस्तास्तु प्राणांस्तन्व इवोत्थिताः।
आरोप्याङ्केऽभिषिंचन्त्यो बाष्पौघैर्विजहुः शुचः॥ ४८
उस समय जैसे मृतक शरीरमें प्राणोंका संचार हो जाय, वैसे ही माताएँ अपने पुत्रोंके आगमनसे हर्षित हो उठीं। उन्होंने उनको अपनी गोदमें बैठा लिया और अपने आँसुओंसे उनका अभिषेक किया। उस समय उनका सारा शोक मिट गया॥ ४८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 9.10.48 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 59) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/10/48/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)