श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.10.51

नवम स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

अग्रहीदासनं भ्रात्रा प्रणिपत्य प्रसादितः।

प्रजाः स्वधर्मनिरता वर्णाश्रमगुणान्विताः।

जुगोप पितृवद् रामो मेनिरे पितरं च तम्॥ ५१

agrahīdāsanaṃ bhrātrā praṇipatya prasāditaḥ|

prajāḥ svadharmaniratā varṇāśramaguṇānvitāḥ|

jugopa pitṛvad rāmo menire pitaraṃ ca tam|| 51

अर्थ

भरतजीने उनके चरणोंमें गिरकर उन्हें प्रसन्‍न किया और उनके आग्रह करनेपर भगवान् श्रीरामने राजसिंहासन स्वीकार किया। इसके बाद वे अपने-अपने धर्ममें तत्पर तथा वर्णाश्रमके आचारको निभानेवाली प्रजाका पिताके समान पालन करने लगे। उनकी प्रजा भी उन्हें अपना पिता ही मानती थी॥ ५१॥✎ 1639

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1639 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: विधि-पूर्वक → विधिपूर्वक

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें