भगवान् श्रीरामने एकपत्नीका व्रत धारण कर रखा था, उनके चरित्र अत्यन्त पवित्र एवं राजर्षियोंके-से थे। वे गृहस्थोचित स्वधर्मकी शिक्षा देनेके लिये स्वयं उस धर्मका आचरण करते थे॥ ५५॥✎ 1640
एकपत्नीव्रतधरो राजर्षिचरितः शुचिः।
स्वधर्मं गृहमेधीयं शिक्षयन् स्वयमाचरत्॥ ५५
भगवान् श्रीरामने एकपत्नीका व्रत धारण कर रखा था, उनके चरित्र अत्यन्त पवित्र एवं राजर्षियोंके-से थे। वे गृहस्थोचित स्वधर्मकी शिक्षा देनेके लिये स्वयं उस धर्मका आचरण करते थे॥ ५५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 9.10.55 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 60) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/10/55/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)