श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.11.21

नवम स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

यस्यामलं नृपसदस्सु यशोऽधुनापि

गायन्त्यघघ्नमृषयो दिगिभेन्द्रपट्टम्।

तं नाकपालवसुपालकिरीटजुष्ट-

पादाम्बुजं रघुपतिं शरणं प्रपद्ये॥ २१

yasyāmalaṃ nṛpasadassu yaśo'dhunāpi

gāyantyaghaghnamṛṣayo digibhendrapaṭṭam|

taṃ nākapālavasupālakirīṭajuṣṭa-

pādāmbujaṃ raghupatiṃ śaraṇaṃ prapadye|| 21

अर्थ

भगवान् श्रीरामका निर्मल यश समस्त पापोंको नष्ट कर देनेवाला है। वह इतना फैल गया है कि दिग्गजोंका श्यामल शरीर भी उसकी उज्ज्वलतासे चमक उठता है। आज भी बड़े-बड़े ऋषि-महर्षि राजाओंकी सभामें उसका गान करते रहते हैं। स्वर्गके देवता और पृथ्वीके नरपति अपने कमनीय किरीटोंसे उनके चरणकमलोंकी सेवा करते रहते हैं। मैं उन्हीं रघुवंशशिरोमणि भगवान् श्रीरामचन्द्रकी शरण ग्रहण करता हूँ॥ २१॥

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