श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.13.10

नवम स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

देहं नावरुरुत्सेऽहं दुःखशोकभ२यावहम्।

सर्वत्रास्य यतो मृत्युर्मत्स्यानामुदके यथा॥ १०

dehaṃ nāvarurutse'haṃ duḥkhaśokabhayāvaham|

sarvatrāsya yato mṛtyurmatsyānāmudake yathā|| 10

अर्थ

अतः मैं अब दुःख, शोक और भयके मूल कारण इस शरीरको धारण करना नहीं चाहता। जैसे जलमें मछलीके लिये सर्वत्र ही मृत्युके अवसर हैं, वैसे ही इस शरीरके लिये भी सब कहीं मृत्यु-ही-मृत्यु है’॥ १०॥

टिप्पणियाँ

  1. २

    याश्रयात्।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 67)

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