अतः मैं अब दुःख, शोक और भयके मूल कारण इस शरीरको धारण करना नहीं चाहता। जैसे जलमें मछलीके लिये सर्वत्र ही मृत्युके अवसर हैं, वैसे ही इस शरीरके लिये भी सब कहीं मृत्यु-ही-मृत्यु है’॥ १०॥
देहं नावरुरुत्सेऽहं दुःखशोकभयावहम्।
सर्वत्रास्य यतो मृत्युर्मत्स्यानामुदके यथा॥ १०
अतः मैं अब दुःख, शोक और भयके मूल कारण इस शरीरको धारण करना नहीं चाहता। जैसे जलमें मछलीके लिये सर्वत्र ही मृत्युके अवसर हैं, वैसे ही इस शरीरके लिये भी सब कहीं मृत्यु-ही-मृत्यु है’॥ १०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 9.13.10 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 67) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/13/10/