श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.14.15

नवम स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

ततः पुरूरवा जज्ञे इलायां य उदाहृतः।

तस्य रूपगुणौदार्यशीलद्रविणविक्रमान्॥ १५

tataḥ purūravā jajñe ilāyāṃ ya udāhṛtaḥ|

tasya rūpaguṇaudāryaśīladraviṇavikramān|| 15

अर्थ

परीक्षित्! बुधके द्वारा इलाके गर्भसे पुरूरवाका जन्म हुआ। इसका वर्णन मैं पहले ही कर चुका हूँ। एक दिन इन्द्रकी सभामें देवर्षि नारदजी पुरूरवाके रूप, गुण, उदारता, शील-स्वभाव, धन-सम्पत्ति और पराक्रमका गान कर रहे थे। उन्हें सुनकर उर्वशीके हृदयमें कामभावका उदय हो आया और उससे पीड़ित होकर वह देवांगना पुरूरवाके पास चली आयी॥ १५-१६॥✎ 2050

यह अर्थ श्लोक 15–16 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #2050 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि

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