श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.14.17

नवम स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

मित्रावरुणयोः शापादापन्‍ना नरलोकताम्।

निशम्य पुरुषश्रेष्ठं कन्दर्पमिव रूपिणम्।

धृतिं विष्टभ्य ललना उपतस्थे तदन्तिके॥ १७

mitrāvaruṇayoḥ śāpādāpannā naralokatām|

niśamya puruṣaśreṣṭhaṃ kandarpamiva rūpiṇam|

dhṛtiṃ viṣṭabhya lalanā upatasthe tadantike|| 17

अर्थ

यद्यपि उर्वशीको मित्रावरुणके शापसे ही मृत्युलोकमें आना पड़ा था, फिर भी पुरुषशिरोमणि पुरूरवा मूर्तिमान् कामदेवके समान सुन्दर हैं—यह सुनकर सुर-सुन्दरी उर्वशीने धैर्य धारण किया और वह उनके पास चली आयी॥ १७॥

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