श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.14.23

नवम स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

अहो रूपमहो भावो नरलोकविमोहनम्।

को न सेवेत मनुजो देवीं त्वां स्वयमागताम्॥ २३

aho rūpamaho bhāvo naralokavimohanam|

ko na seveta manujo devīṃ tvāṃ svayamāgatām|| 23

अर्थ

और फिर उर्वशीसे कहा—‘तुम्हारा यह सौन्दर्य अद्भुत है। तुम्हारा भाव अलौकिक है। यह तो सारी मनुष्यसृष्टिको मोहित करनेवाला है। और देवि! कृपा करके तुम स्वयं यहाँ आयी हो। फिर कौन ऐसा मनुष्य है जो तुम्हारा सेवन न करेगा?॥ २३॥

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