श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.14.33

नवम स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

स तां वीक्ष्य कुरुक्षेत्रे सरस्वत्यां च तत्सखीः।

पंच प्रहृष्टवदनाः प्राह सूक्तं पुरूरवाः॥ ३३

sa tāṃ vīkṣya kurukṣetre sarasvatyāṃ ca tatsakhīḥ|

paṃca prahṛṣṭavadanāḥ prāha sūktaṃ purūravāḥ|| 33

अर्थ

एक दिन कुरुक्षेत्रमें सरस्वती नदीके तटपर उन्होंने उर्वशी और उसकी पाँच प्रसन्‍नमुखी सखियोंको देखा और बड़ी मीठी वाणीसे कहा—॥ ३३॥✎ 2051

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #2051 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें