॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 9.15.18
बाहून् दशशतं लेभे दुर्धर्षत्वमरातिषु।
अव्याहतेन्द्रियौजःश्रीतेजोवीर्ययशो२बलम्॥ १८
bāhūn daśaśataṃ lebhe durdharṣatvamarātiṣu|
avyāhatendriyaujaḥśrītejovīryayaśobalam|| 18
अर्थ
श्रीशुकदेवजी कहने लगे—परीक्षित्! उन दिनों हैहयवंशका अधिपति था अर्जुन। वह एक श्रेष्ठ क्षत्रिय था। उसने अनेकों प्रकारकी सेवा-शुश्रूषा करके भगवान् नारायणके अंशावतार दत्तात्रेयजीको प्रसन्न कर लिया और उनसे एक हजार भुजाएँ तथा कोई भी शत्रु युद्धमें पराजित न कर सके—यह वरदान प्राप्त कर लिया। साथ ही इन्द्रियोंका अबाध बल, अतुल सम्पत्ति, तेजस्विता, वीरता, कीर्ति और शारीरिक बल भी उसने उनकी कृपासे प्राप्त कर लिये थे॥ १७-१८॥
टिप्पणियाँ
- २
शोऽतुलम्।