॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 9.15.32
दृष्ट्वा स्वसैन्यं रुधिरौघकर्दमे
रणाजिरे रामकुठारसायकैः।
विवृक्णचर्मध्वजचापविग्रहं
निपातितं हैहय आपतद् रुषा॥ ३२
dṛṣṭvā svasainyaṃ rudhiraughakardame
raṇājire rāmakuṭhārasāyakaiḥ|
vivṛkṇacarmadhvajacāpavigrahaṃ
nipātitaṃ haihaya āpatad ruṣā|| 32
अर्थ
हैहयाधिपति अर्जुनने देखा कि मेरी सेनाके सैनिक, उनके धनुष, ध्वजाएँ और ढाल भगवान् परशुरामके फरसे और बाणोंसे कट-कटकर खूनसे लथपथ रणभूमिमें गिर गये हैं, तब उसे बड़ा क्रोध आया और वह स्वयं भिड़नेके लिये आ धमका॥ ३२॥