श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.16.22

नवम स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

अन्येभ्योऽवान्तरदिशः कश्यपाय च मध्यतः।

आर्यावर्तमुपद्रष्ट्रे सदस्येभ्यस्ततः परम्॥ २२

anyebhyo'vāntaradiśaḥ kaśyapāya ca madhyataḥ|

āryāvartamupadraṣṭre sadasyebhyastataḥ param|| 22

अर्थ

इसी प्रकार अग्‍निकोण आदि विदिशाएँ ऋत्विजोंको दीं, कश्यपजीको मध्यभूमि दी, उपद्रष्टाको आर्यावर्त दिया तथा दूसरे सदस्योंको अन्यान्य दिशाएँ प्रदान कर दीं॥ २२॥

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