श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.16.4

नवम स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

कालात्ययं तं विलोक्य मुनेः शापविशंकिता।

आगत्य कलशं तस्थौ पुरोधाय कृतांजलिः॥ ४

kālātyayaṃ taṃ vilokya muneḥ śāpaviśaṃkitā|

āgatya kalaśaṃ tasthau purodhāya kṛtāṃjaliḥ|| 4

अर्थ

हवनका समय बीत गया, यह जानकर वे महर्षि जमदग्‍निके शापसे भयभीत हो गयीं और तुरंत वहाँसे आश्रमपर चली आयीं। वहाँ जलका कलश महर्षिके सामने रखकर हाथ जोड़ खड़ी हो गयीं॥ ४॥

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