श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.18.1

नवम स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

अथाष्टादशोऽध्यायः

ययाति-चरित्र

श्रीशुक उवाच

यतिर्ययातिः संयातिरायतिर्वियतिः कृतिः।

षडिमे नहुषस्यासन्‍निन्द्रियाणीव देहिनः॥ १

yatiryayātiḥ saṃyātirāyatirviyatiḥ kṛtiḥ|

ṣaḍime nahuṣasyāsannindriyāṇīva dehinaḥ|| 1

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! जैसे शरीरधारियोंके छः इन्द्रियाँ होती हैं, वैसे ही नहुषके छः पुत्र थे। उनके नाम थे—यति, ययाति, संयाति, आयति, वियति और कृति॥ १॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें