श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.18.16

नवम स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

आत्मवृत्तमविज्ञाय कत्थसे बहु भिक्षुकि।

किं न प्रतीक्षसेऽस्माकं गृहान् बलिभुजो यथा॥ १६

ātmavṛttamavijñāya katthase bahu bhikṣuki|

kiṃ na pratīkṣase'smākaṃ gṛhān balibhujo yathā|| 16

अर्थ

‘भिखारिन! तू इतना बहक रही है। तुझे कुछ अपनी बातका भी पता है? जैसे कौए और कुत्ते हमारे दरवाजेपर रोटीके टुकड़ोंके लिये प्रतीक्षा करते हैं, वैसे ही क्या तुम भी हमारे घरोंकी ओर नहीं ताकती रहतीं’॥ १६॥

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