॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 9.18.21
हस्तग्राहोऽपरो मा भूद् गृहीतायास्त्वया हि मे।
एष ईशकृतो वीर सम्बन्धो नौ न पौरुषः।
यदिदं कूपलग्नाया भवतो दर्शनं मम॥ २१
hastagrāho'paro mā bhūd gṛhītāyāstvayā hi me|
eṣa īśakṛto vīra sambandho nau na pauruṣaḥ|
yadidaṃ kūpalagnāyā bhavato darśanaṃ mama|| 21
अर्थ
देवयानीने प्रेमभरी वाणीसे वीर ययातिसे कहा—‘वीरशिरोमणे राजन्! आज आपने मेरा हाथ पकड़ा है। अब जब आपने मेरा हाथ पकड़ लिया, तब कोई दूसरा इसे न पकड़े। वीरश्रेष्ठ! कूएँमें गिर जानेपर मुझे जो आपका अचानक दर्शन हुआ है, यह भगवान्का ही किया हुआ सम्बन्ध समझना चाहिये। इसमें हमलोगोंकी या और किसी मनुष्यकी कोई चेष्टा नहीं है॥ २०-२१॥