श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.18.23

नवम स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

ययातिरनभिप्रेतं दैवोपहृतमात्मनः।

मनस्तु तद्गतं बुद‍्ध्वा प्रतिजग्राह तद्वचः॥ २३

yayātiranabhipretaṃ daivopahṛtamātmanaḥ|

manastu tadgataṃ buddhvā pratijagrāha tadvacaḥ|| 23

अर्थ

ययातिको शास्त्रप्रतिकूल होनेके कारण यह सम्बन्ध अभीष्ट तो न था; परन्तु उन्होंने देखा कि प्रारब्धने स्वयं ही मुझे यह उपहार दिया है और मेरा मन भी इसकी ओर खिंच रहा है। इसलिये ययातिने उसकी बात मान ली॥ २३॥

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