श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.18.26

नवम स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

वृषपर्वा तमाज्ञाय प्रत्यनीकविवक्षितम्।

गुरुं प्रसादयन् मूर्ध्ना पादयोः पतितः पथि॥ २६

vṛṣaparvā tamājñāya pratyanīkavivakṣitam|

guruṃ prasādayan mūrdhnā pādayoḥ patitaḥ pathi|| 26

अर्थ

जब वृषपर्वाको यह मालूम हुआ तो उनके मनमें यह शंका हुई कि गुरुजी कहीं शत्रुओंकी जीत न करा दें, अथवा मुझे शाप न दे दें। अतएव वे उनको प्रसन्‍न करनेके लिये पीछे-पीछे गये और रास्तेमें उनके चरणोंपर सिरके बल गिर गये॥ २६॥

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