श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.18.44

नवम स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

उत्तमश्‍चिन्तितं कुर्यात् प्रोक्तकारी तु मध्यमः।

अधमोऽश्रद्धया कुर्यादकर्तोच्चरितं पितुः॥ ४४

uttamaścintitaṃ kuryāt proktakārī tu madhyamaḥ|

adhamo'śraddhayā kuryādakartoccaritaṃ pituḥ|| 44

अर्थ

उत्तम पुत्र तो वह है जो पिताके मनकी बात बिना कहे ही कर दे। कहनेपर श्रद्धाके साथ आज्ञापालन करनेवाले पुत्रको मध्यम कहते हैं। जो आज्ञा प्राप्त होनेपर भी अश्रद्धासे उसका पालन करे, वह अधम पुत्र है। और जो किसी प्रकार भी पिताकी आज्ञाका पालन नहीं करता, उसको तो पुत्र कहना ही भूल है। वह तो पिताका मल-मूत्र ही है॥ ४४॥

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