वे सातों द्वीपोंके एकच्छत्र सम्राट् थे। पिताके समान भलीभाँति प्रजाका पालन करते थे। उनकी इन्द्रियोंमें पूरी शक्ति थी और वे यथावसर यथाप्राप्त विषयोंका यथेच्छ उपभोग करते थे॥ ४६॥
सप्तद्वीपपतिः सम्यक् पितृवत् पालयन् प्रजाः।
यथोपजोषं विषयांजुजुषेऽव्याहतेन्द्रियः॥ ४६
वे सातों द्वीपोंके एकच्छत्र सम्राट् थे। पिताके समान भलीभाँति प्रजाका पालन करते थे। उनकी इन्द्रियोंमें पूरी शक्ति थी और वे यथावसर यथाप्राप्त विषयोंका यथेच्छ उपभोग करते थे॥ ४६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 9.18.46 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 91) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/18/46/