श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.19.16

नवम स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

या दुस्त्यजा दुर्मतिभिर्जीर्यतो या न जीर्यते।

तां तृष्णां दुःखनिवहां शर्मकामो द्रुतं त्यजेत्॥ १६

yā dustyajā durmatibhirjīryato yā na jīryate|

tāṃ tṛṣṇāṃ duḥkhanivahāṃ śarmakāmo drutaṃ tyajet|| 16

अर्थ

विषयोंकी तृष्णा ही दुःखोंका उद्गम स्थान है। मन्दबुद्धि लोग बड़ी कठिनाईसे उसका त्याग कर सकते हैं। शरीर बूढ़ा हो जाता है, पर तृष्णा नित्य नवीन ही होती जाती है। अतः जो अपना कल्याण चाहता है, उसे शीघ्र-से-शीघ्र इस तृष्णा (भोगवासना) का त्याग कर देना चाहिये॥ १६॥✎ 1645

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1645 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: (भोग-वासना) → (भोगवासना)

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