श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.19.6

नवम स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

पीवानं श्मश्रुलं प्रेष्ठं मीढ्वांसं याभकोविदम्।

स एकोऽजवृषस्तासां बह्वीनां रतिवर्धनः।

रेमे कामग्रहग्रस्त आत्मानं नावबुध्यत॥ ६

pīvānaṃ śmaśrulaṃ preṣṭhaṃ mīḍhvāṃsaṃ yābhakovidam|

sa eko'javṛṣastāsāṃ bahvīnāṃ rativardhanaḥ|

reme kāmagrahagrasta ātmānaṃ nāvabudhyata|| 6

अर्थ

जब वह सुन्दरी बकरी कूएँसे निकली तो उसने उस बकरेसे ही प्रेम करना चाहा। वह दाढ़ी-मूँछमण्डित बकरा हृष्ट-पुष्ट, जवान, बकरियोंको सुख देनेवाला, विहारकुशल और बहुत प्यारा था। जब दूसरी बकरियोंने देखा कि कूएँमें गिरी हुई बकरीने उसे अपना प्रेमपात्र चुन लिया है, तब उन्होंने भी उसीको अपना पति बना लिया। वे तो पहलेसे ही पतिकी तलाशमें थीं। उस बकरेके सिरपर कामरूप पिशाच सवार था। वह अकेला ही बहुत-सी बकरियोंके साथ विहार करने लगा और अपनी सब सुध-बुध खो बैठा॥ ५-६॥✎ 1644

यह अर्थ श्लोक 5–6 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1644 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: ग्राम-वासी → ग्रामवासी

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