श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.2.1

नवम स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

अथ द्वितीयोऽध्यायः

पृषध्र आदि मनुके पाँच पुत्रोंका वंश

श्रीशुक उवाच

एवं गतेऽथ सुद्युम्‍ने मनुर्वैवस्वतः सुते।

पुत्रकामस्तपस्तेपे यमुनायां शतं समाः॥ १

evaṃ gate'tha sudyumne manurvaivasvataḥ sute|

putrakāmastapastepe yamunāyāṃ śataṃ samāḥ|| 1

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! इस प्रकार जब सुद्युम्‍न तपस्या करनेके लिये वनमें चले गये, तब वैवस्वत मनुने पुत्रकी कामनासे यमुनाके तटपर सौ वर्षतक तपस्या की॥ १॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें