पृषध्रने अपने गुरुदेवका यह शाप अंजलि बाँधकर स्वीकार किया और इसके बाद सदाके लिये मुनियोंको प्रिय लगनेवाले नैष्ठिक ब्रह्मचर्य-व्रतको धारण किया॥ १०॥
एवं शप्तस्तु गुरुणा प्रत्यगृह्णात् कृतांजलिः।
अधारयद् व्रतं वीर ऊर्ध्वरेता मुनिप्रियम्॥ १०
पृषध्रने अपने गुरुदेवका यह शाप अंजलि बाँधकर स्वीकार किया और इसके बाद सदाके लिये मुनियोंको प्रिय लगनेवाले नैष्ठिक ब्रह्मचर्य-व्रतको धारण किया॥ १०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 9.2.10 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 12) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/2/10/