॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 9.20.1
अथ विंशोऽध्यायः
पूरुके वंश, राजा दुष्यन्त और भरतके चरित्रका वर्णन
श्रीशुक उवाच
पूरोर्वंशं प्रवक्ष्यामि यत्र जातोऽसि भारत।
यत्र राजर्षयो वंश्या ब्रह्मवंश्याश्च जज्ञिरे॥ १
pūrorvaṃśaṃ pravakṣyāmi yatra jāto'si bhārata|
yatra rājarṣayo vaṃśyā brahmavaṃśyāśca jajñire|| 1
अर्थ
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! अब मैं राजा पूरुके वंशका वर्णन करूँगा। इसी वंशमें तुम्हारा जन्म हुआ है। इसी वंशके वंशधर बहुत-से राजर्षि और ब्रह्मर्षि भी हुए हैं॥ १॥ पूरुका पुत्र हुआ जनमेजय। जनमेजयका प्रचिन्वान्, प्रचि-न्वान्का प्रवीर, प्रवीरका नमस्यु और नमस्युका पुत्र हुआ चारुपद॥ २॥ चारुपदसे सुद्यु, सुद्युसे बहुगव, बहुगवसे संयाति, संयातिसे अहंयाति और अहंयातिसे रौद्राश्व हुआ॥ ३॥