svayaṃ hi vṛṇate rājñāṃ kanyakāḥ sadṛśaṃ varam|| 15
अर्थ
दुष्यन्तने कहा—‘सुन्दरी! तुम कुशिकवंशमें उत्पन्न हुई हो, इसलिये इस प्रकारका आतिथ्यसत्कार तुम्हारे योग्य ही है। क्योंकि राजकन्याएँ स्वयं ही अपने योग्य पतिको वरण कर लिया करती हैं’॥ १५॥
उपपन्नमिदं सुभ्रु जातायाः कुशिकान्वये।
स्वयं हि वृणते राज्ञां कन्यकाः सदृशं वरम्॥ १५
दुष्यन्तने कहा—‘सुन्दरी! तुम कुशिकवंशमें उत्पन्न हुई हो, इसलिये इस प्रकारका आतिथ्यसत्कार तुम्हारे योग्य ही है। क्योंकि राजकन्याएँ स्वयं ही अपने योग्य पतिको वरण कर लिया करती हैं’॥ १५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 9.20.15 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 96) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/20/15/