श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.20.36

नवम स्कन्ध · अध्याय 20 · अथ विंशोऽध्यायः

अन्तर्वत्‍न्यां भ्रातृपत्‍न्यां मैथुनाय बृहस्पतिः।

प्रवृत्तो वारितो गर्भं शप्त्वा वीर्यमवासृजत्॥ ३६

antarvatnyāṃ bhrātṛpatnyāṃ maithunāya bṛhaspatiḥ|

pravṛtto vārito garbhaṃ śaptvā vīryamavāsṛjat|| 36

अर्थ

भरद्वाजकी उत्पत्तिका प्रसंग यह है कि एक बार बृहस्पतिजीने अपने भाई उतथ्यकी गर्भवती पत्‍नीसे मैथुन करना चाहा। उस समय गर्भमें जो बालक (दीर्घतमा) था, उसने मना किया। किन्तु बृहस्पतिजीने उसकी बातपर ध्यान न दिया और उसे ‘तू अंधा हो जा’ यह शाप देकर बलपूर्वक गर्भाधान कर दिया॥ ३६॥✎ 1648

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1648 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: मरुद्-गणोंने → मरुद्गणोंने

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