अब केवल जल ही बच रहा था और वह भी केवल एक मनुष्यके पीनेभरका था। वे उसे आपसमें बाँटकर पीना ही चाहते थे कि एक चाण्डाल और आ पहुँचा। उसने कहा—‘मैं अत्यन्त नीच हूँ। मुझे जल पिला दीजिये’॥ १०॥✎ 881
पानीयमात्रमुच्छेषं तच्चैकपरितर्पणम्।
पास्यतः पुल्कसोऽभ्यागादपो देह्यशुभस्य मे॥ १०
अब केवल जल ही बच रहा था और वह भी केवल एक मनुष्यके पीनेभरका था। वे उसे आपसमें बाँटकर पीना ही चाहते थे कि एक चाण्डाल और आ पहुँचा। उसने कहा—‘मैं अत्यन्त नीच हूँ। मुझे जल पिला दीजिये’॥ १०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 9.21.10 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 101) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/21/10/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)