श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.21.10

नवम स्कन्ध · अध्याय 21 · अथैकविंशोऽध्यायः

पानीयमात्रमुच्छेषं तच्चैकपरितर्पणम्।

पास्यतः पुल्कसोऽभ्यागादपो देह्यशुभस्य मे॥ १०

pānīyamātramuccheṣaṃ taccaikaparitarpaṇam|

pāsyataḥ pulkaso'bhyāgādapo dehyaśubhasya me|| 10

अर्थ

अब केवल जल ही बच रहा था और वह भी केवल एक मनुष्यके पीनेभरका था। वे उसे आपसमें बाँटकर पीना ही चाहते थे कि एक चाण्डाल और आ पहुँचा। उसने कहा—‘मैं अत्यन्त नीच हूँ। मुझे जल पिला दीजिये’॥ १०॥✎ 881

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #881 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्‌से

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