॥ श्रीहरिः ॥
जनमेजयस्त्वां विदित्वा तक्षकान्निधनं गतम्।
सर्पान् वै सर्पयागाग्नौ स होष्यति रुषान्वितः॥ ३६
janamejayastvāṃ viditvā takṣakānnidhanaṃ gatam|
sarpān vai sarpayāgāgnau sa hoṣyati ruṣānvitaḥ|| 36
अर्थ
जब तक्षकके काटनेसे तुम्हारी मृत्यु हो जायगी, तब इस बातको जानकर जनमेजय बहुत क्रोधित होगा और यह सर्प-यज्ञकी आगमें सर्पोंका हवन करेगा॥ ३६॥
जनमेजयस्त्वां विदित्वा तक्षकान्निधनं गतम्।
सर्पान् वै सर्पयागाग्नौ स होष्यति रुषान्वितः॥ ३६
जब तक्षकके काटनेसे तुम्हारी मृत्यु हो जायगी, तब इस बातको जानकर जनमेजय बहुत क्रोधित होगा और यह सर्प-यज्ञकी आगमें सर्पोंका हवन करेगा॥ ३६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 9.22.36 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 107) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/22/36/