श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.24.57

नवम स्कन्ध · अध्याय 24 · अथ चतुर्विंशोऽध्यायः

न ह्यस्य जन्मनो हेतुः कर्मणो वा महीपते।

आत्ममायां विनेशस्य परस्य द्रष्टुरात्मनः॥ ५७

na hyasya janmano hetuḥ karmaṇo vā mahīpate|

ātmamāyāṃ vineśasya parasya draṣṭurātmanaḥ|| 57

अर्थ

परीक्षित्! भगवान् सबके द्रष्टा और वास्तवमें असंग आत्मा ही हैं। इसलिये उनकी आत्मस्वरूपिणी योगमायाके अतिरिक्त उनके जन्म अथवा कर्मका और कोई भी कारण नहीं है॥ ५७॥✎ 1396

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1396 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): ह्रस → ह्रास

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